पिता और आकाश

पिता भले ही वृध्द है पर पुत्र की छत्रछाया है

अंतहीन आकाश में एक सूर्य जगमगाया है

आशाओ से भरा क्षितिज है विश्वास की गंध है

प्राणों में रहता एक पिता से पुत्र का अनुबंधहै

पिता का सरंक्षण मात्र हमे देता आश्वस्ति है

पिता के रहते पुत्र को कोई विपदाएं नही छू सकती है

उनकी वैचारिक उपस्थिति से ही जीवन की प्रशस्ति है

पिता से हमने मातृवत स्नेह पाया है

पिता एक शरीर नही एक ऊर्जा है

जिसे हमने अपनाया है

पिता पथ पर चलने की एक प्रेरणा है

जो प्रतिपल आत्मविश्वास बढ़ाती है

निराश और उदास मन में आशा जगाती है

पिताजी तुम्हारी याद मुझे हर पल सताती है

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नेह और सत्कार है

भ्रमर गुंजित हो रहे है

सुगंध का त्यौहार है

ओंस भी दुबकी हुई है

पुष्प का श्रृंगार है

चहचहाती आ रही है

पंछियो की टोलियां

झील के झील मील किनारे

नेह और सत्कार है

जिंदगी मझदार नदिया

उमड़ता हुआ ज्वार है

लहरो पे उठती है लहरे

यह जल समुद्री खार है

लहरो से लड़ता लड़कपन

लड़ रहा इक जोश है

बढ़ रहे सुनामी खतरे

बढ़ रही रफ्तार है

 

अकेलेपन का दर्द

खामोशी में खंडहर

और खंडहर में खामोशी है

एक अजीब बैचैनी है

गहराती रातो में

सन्नाटो में पसरी हुई

एक पुरानी कहानी है

एकान्तता कभी काटती है

कभी स्वयं को बांचती है

वास्तविकताएं जीवन की

इन्ही पलो के बीच विराजती है

कही कोई पत्ते की खरखराहट

तोड़ते है

सन्नाटो की एकान्तता को

तब पता चलता है अकेलेपन का दर्द

हिंदी

हिंदी है अद्भुत नव भाषा छंद अलंकृत सब गुण पाए
चैत्र मास की प्रतिपदा है दिव्य ज्योति नव रात्र जगाये
नवल कोपले लगी मचलने मिलने लगी फूलो को भाषा
तृप्त हुआ मन रहा जो प्यासा नवीन वर्ष में गीत बनाये

रहता वह महफूज

कितने बंदोबस्त हुए

हुई व्यवस्था ध्वस्त

भीड़ बढ़ी है भक्तन की

जेब कटी से त्रस्त

तीर्थो पर पंडे खड़े

बनी हुई है न्यूज

मीडिया जिसके साथ रहे

रहता वह महफूज

छोटा मोटा प्यारा सा

बच्चा एक शैतान

दादा जी ने पाई अब

लाखो की मुस्कान

यादे

याद आज जो आई हैै

मन मे भरी रुलाई है

दिलवर का अफसाना है

उनको नही सताना है

रस्मे कसमे खाई है

सपनो की परछाई हैै

हरी भरी यह पेड़ है

जड़ से जुड़ता पेड़ है

मिट्टी होती माई है

जुडती पाई पाई है

गौरैया

जगमग जगमग दीप रहे

डग मग डग मग नाव

मन निर्मल तव प्रीत रहा

निश्छल होते भाव

चलते कई षड्यंत्र रहे

आपस में तकरार

प्रीत गई अब रिश्तो से

खींच गई तलवार

इस उपवन उग आईं है

हरी भरी सी दूब

गौरैया फिर आई है

इक इक दाना चुग

मन कड़वे न भाव रहे

मन मे रहे उमाँग

तन तेरा परिपुष्ट रहे

उड़ती रहे पतंग