अकर्मण्यता

अकर्मण्यता महारोग है जिसे देशी भाषा निकम्मापन भी कहा जाता है कुछ लोग बेरोजगारी को इसके लिए दोषी मानते है वे बेरोजगार इसलिए है क्योंकि उनको उनके लायक काम नही मिल रहा है और जो काम उन्हें मिल रहा है वे अपने आपको उसके लायक नही समझते उन्होंने भले स्वयम की क्षमताओं के बारे में कई भ्रांतिया पाल रखी है परंतु उन्होंने स्वयं को कार्य कुशल बनाने के लिए कोई प्रयास नही किये । कार्य कुशलता के बिना कार्य मिल सकता है इस तथ्य को भुला चुके इसलिए वे बेरोजगार है बेरोजगार है इसलिए निकम्मे है बुरी बात तो यह है कि निकम्मापन उनके सोच और स्वास्थ्य को खोखला कर रहा हैं व्यक्ति के व्यक्तित्व का परिचय उसके कार्य होता है निकम्मापन व्यक्ति को व्यक्तित्व शून्य बना देता है पर वे हैरान है परेशान है कि करे तो क्या करे । इसी निकम्मेपन ने हमारी युवा पीढ़ी को बेरोजगार बनाया है बेरोजगार शब्द की उतपत्ति ने देश को निकम्मे पन की बीमारी दी है पुराने जमाने कोई बेरोजगार नही होता था अशिक्षित या अल्प शिक्षित हो सकता था शिक्षित होने का मतलब जब से  नोकरी की प्राप्ति को मान लिया गया है तब से निकम्मे लोगो की बन आई है उस आरक्षण का तड़का अलग जबकि उनकी इतनी तैयारी कभी रही जो उन्हें किसी रोजगार के लायक बनाती हो

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दौड़ा रुधीर

प्रीत हुई पनिहारिन नदिया न नीर

चेहरे पर चिंता की खींची लकीर

अपनो न समझी अपनो की पीर

लूट गई खुशिया है फूटी तकदीर

सदियों से नदिया है नदिया में नीर

ठंडक है गहराई घिरता तिमिर

दस्तक वह देती है सपनो में हीर

सपने तो सपने है दिल देते चीर

पनघट पे तट होते मरघट शरीर

प्राणों से काया है दौड़ा रुधीर

गोकुल में कान्हा है यमुना का तीर

यादो का वृंदावन पाया सुधीर

क्रंदन

दुख दर्द पाये है सपनो का क्रंदन है

यादे है प्रियतम की उनका अभिनंदन है

जीना है पीना है जख्मो को सीना है

हृदय की पावनता जीवन का वंदन है

गहराई

गहरा गहरा जल हुआ गहरे होते रंग

ज्यो ज्यो पाई गहराई पाई नई उमंग

गहराई को पाइये गहरा चिंतन होय

उथलेपन में जो रहा मूंगा मोती खोय

गहरा ठहरा जल हुआ ठहरा मन विश्वास

ठहरी मन की आरजू पाई है नव आस

गहराई में खोज मिली गहरे उठी दीवार

गहराई न जाइये गहरी गम की मार

ऊंचाई से उतर रहे लेकर चिंतन वेद

जीवन तो समझाईये गहरे है मतभेद

जब आई हल छठ

आँचल तो आकाश हुआ जब आई हल छठ
सूरज से इस रोज मिले खिल गए है पनघट

कितना प्यारा सच्चा है सूरज तेरा प्यार
किरणों से है ओज मिला जीवन को उपचार

निर्मल जल सी सांझ रहे बांझ रहे न कोय
दिनकर संग जो जाग रहा भाग्य उसी का सोय

पटना की है परम्परा नदियों के है तट
डूबते को भी प्यार मिला सूरज की हल छठ

उजियारा

उजियाला का पर्व हुआ उजला होता रूप

उम्मीदों के साथ रही सपनो की यह धूप

मौसम सर्दी व्याप्त रही झंकृत मन के तार

दीपो से रोशन हुए घर आँगन दीवार

भीतर से जो रिक्त रहा जीवन उसका ज्वार

तूफानो में तिर आई नैया बारम्बार