दौड़ा रुधीर

प्रीत हुई पनिहारिन नदिया न नीर

चेहरे पर चिंता की खींची लकीर

अपनो न समझी अपनो की पीर

लूट गई खुशिया है फूटी तकदीर

सदियों से नदिया है नदिया में नीर

ठंडक है गहराई घिरता तिमिर

दस्तक वह देती है सपनो में हीर

सपने तो सपने है दिल देते चीर

पनघट पे तट होते मरघट शरीर

प्राणों से काया है दौड़ा रुधीर

गोकुल में कान्हा है यमुना का तीर

यादो का वृंदावन पाया सुधीर

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क्रंदन

दुख दर्द पाये है सपनो का क्रंदन है

यादे है प्रियतम की उनका अभिनंदन है

जीना है पीना है जख्मो को सीना है

हृदय की पावनता जीवन का वंदन है

गहराई

गहरा गहरा जल हुआ गहरे होते रंग

ज्यो ज्यो पाई गहराई पाई नई उमंग

गहराई को पाइये गहरा चिंतन होय

उथलेपन में जो रहा मूंगा मोती खोय

गहरा ठहरा जल हुआ ठहरा मन विश्वास

ठहरी मन की आरजू पाई है नव आस

गहराई में खोज मिली गहरे उठी दीवार

गहराई न जाइये गहरी गम की मार

ऊंचाई से उतर रहे लेकर चिंतन वेद

जीवन तो समझाईये गहरे है मतभेद

जब आई हल छठ

आँचल तो आकाश हुआ जब आई हल छठ
सूरज से इस रोज मिले खिल गए है पनघट

कितना प्यारा सच्चा है सूरज तेरा प्यार
किरणों से है ओज मिला जीवन को उपचार

निर्मल जल सी सांझ रहे बांझ रहे न कोय
दिनकर संग जो जाग रहा भाग्य उसी का सोय

पटना की है परम्परा नदियों के है तट
डूबते को भी प्यार मिला सूरज की हल छठ

उजियारा

उजियाला का पर्व हुआ उजला होता रूप

उम्मीदों के साथ रही सपनो की यह धूप

मौसम सर्दी व्याप्त रही झंकृत मन के तार

दीपो से रोशन हुए घर आँगन दीवार

भीतर से जो रिक्त रहा जीवन उसका ज्वार

तूफानो में तिर आई नैया बारम्बार

तिल तिल देकर आहुति से

यहाँ शब्द नहीं अनुभूति है 

अनुभव से सब कुछ पाया है

अनुभूति जितनी गहरी हो 

ठहरी उतनी ही काया है

 

जब घना अँधेरा छाता है

 चिंतन गहरा हो जाता है

मन यादो की कस्तूरी से

 खुशबू लेकर कुछ गाता है

खुशबू से नज्मे भरी हुई 

यहाँ दर्द हुआ हम साया है 

 

जहाँ ह्रदय मिला कोई घाव नहीं 

वहा शब्द रहे पर भाव नहीं

 जो मस्त रहा है हर पल पल 

जीवन रहते अभाव नहीं  

मस्ती में झूम झूम कर हरदम

नव गीत अनोखा पाया है 

 

जहा रही वेदना मर्म रहा

रचना का अपना धर्म रहा

कोई धन्य हुआ अनुभूति से

तिल तिल देकर आहुति से

वह मानवता का वंदन कर

जीवन को समझा पाया है